रामकथा के छठे दिन "केवट प्रसंग व भरत मिलाप का अत्यंत मार्मिक वर्णन"

 रामकथा के छठे दिन "केवट प्रसंग व भरत मिलाप का अत्यंत मार्मिक वर्णन"

सैदपुर : नगर स्थित बूढ़ेनाथ महादेव पर आयोजित सप्तदिवसीय रामकथा के छठे दिन आचार्य शांतनु जी महाराज ने केवट प्रसंग व भरत मिलाप का अत्यंत मार्मिक वर्णन किया।उन्होंने केवट प्रसंग का वर्णन करते हुए कहा - भगवान राम की अटूट भक्त-वत्सलता और केवट के निश्छल प्रेम व तर्कों को दर्शाता है। 
बताया कि प्रबल प्रेम के पाले पड़कर प्रभु को नियम बदलते देखा। गंगाजी का किनारा भक्ति का घाट है और केवट भगवान का परम भक्त है, किंतु वह अपनी भक्ति का प्रदर्शन नहीं करना चाहते थे । अत: वह भगवान से अटपटी वाणी का प्रयोग करते है। केवट ने हठ किया कि आप अपने चरण धुलवाने के लिए मुझे आदेश दे दीजिए, तो मैं आपको पार कर दूंगा केवट ने भगवान से धन-दौलत, पद ऐश्वर्य, कोठी-खजाना नहीं मांगा। उसने भगवान से उनके चरणों का प्रक्षालन मांगा। केवट की नाव से गंगा पार करके भगवान ने केवट को उतराई देने का विचार किया। सीता जी ने अर्धागिनी स्वरूप को सार्थक करते हुए भगवान की मन की बात समझकर अपनी कर-मुद्रिका उतारकर उन्हें दे दी। भगवान ने उसे केवट को देने का प्रयास किया, किंतु केवट ने उसे न लेते हुए भगवान के चरणों को पकड़ लिया। जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है, ऐसे भगवान के श्रीचरणों की सेवा से केवट धन्य हो गये। भगवान ने उसके निस्वार्थ प्रेम को देखकर उसे दिव्य भक्ति का वरदान दिया तथा उसकी समस्त इच्छाओं को पूर्ण चित्रकूट पर भगवान का आगमन हुआ। यहां से भील राज (निषाद) भगवान को प्रणाम करके अपने गृह के लिए वापस हुए। मार्ग में शोकातुर सुमंत जी को धैर्य देकर उन्होंने अवध भेजा। सुमंत द्वारा रामजी का वन गमन का समाचार सुनकर महाराज दशरथ ने प्राणों का त्याग कर दिया। महाराज दसरथ की मृत्यु का समाचार सुन भरत जी ने कैकेयी का त्याग करके मां कौशल्या के भवन में आए। माता कौशल्या ने भरत को पूर्ण वात्सल्य प्रदान किया व राम वनवास और दशरथ मरण की संपूर्ण घटना को सुनाया। भरत ने मां के सामने शपथ पूर्वक कहा, मां मैं आपको भगवान श्रीराम से पुन: मिलाउंगा। कथावाचक ने कहा की भाई-भाई के प्रेम का दर्शन कराने के लिए ही श्रीराम और भरत जी के मिलन का प्रसंग आया। दोनों भाई एक दूसरे के लिए संपत्ति और सुखों का त्याग करने के लिए उद्यत थे और विपत्ति को अपनाना चाहते थे। भरत ने भगवान की चरण पादुकाओं को सिंहासन पर आरूढ़ किया और चौदह वर्ष तक उनकी सेवा की। यह भ्रातृ प्रेम की पराकाष्ठा है। भरत जी के नाम का अर्थ ही है- भ अर्थात् भवित, र अर्थात् रति, त अर्थात् त्याग। इस दौरान कथा वाचक ने धर्म का ज्ञान देते हुए कहा की राम कथा मे भोग की कोई प्रतिस्पर्धा नही है उसमे सिर्फ त्याग की प्रतिस्पर्धा है। जिसको अपनी साधना अपने परिश्रम औऱ अपने भगवान पर अटूट विश्वास होता है वो कभी जीवन मे निराश नही होता है। इस मौके पर नवीन अग्रवाल, पंकज अग्रवाल, अभिषेक श्रीवास्तव, हरिद्वार, राकेश चौराशिया, यसवीर सिंह सहित अन्य लोग मौजूद रहे।